जैन ग्रंथ हैं जीवन परिवर्तन का आधार, गुरु के मार्गदर्शन से मिलता है आत्मकल्याण का पथ,,,,

द्विशताब्दी चातुर्मास प्रवचन में पूज्य साध्वी श्री चारित्रकला श्रीजी महारासा ने बताया— धर्मग्रंथों का अध्ययन व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि को बदल देता है,,,,

आलोट। 31जुलाई2026 ( News SSR )नगर में चल रहे द्विशताब्दी चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत आयोजित दैनिक धर्मसभा में पूज्य साध्वी श्री चारित्रकला श्रीजी महारासा ने जैन धर्म में गुरु एवं धर्मग्रंथों की महत्ता पर विस्तृत प्रवचन देते हुए कहा कि जैन आगम और धर्मग्रंथ केवल धार्मिक साहित्य नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाले दिव्य ज्ञान के भंडार हैं। इनमें वर्णित प्रत्येक सिद्धांत सत्य, तर्कसंगत और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाला है। यदि कोई श्रावक या श्राविका श्रद्धा और समर्पण के साथ इन ग्रंथों का अध्ययन अथवा श्रवण करे, तो उसके सोचने, समझने और जीवन जीने का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल सकता है।साध्वी श्री चारित्रकला श्रीजी महारासा ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं और भौतिक उपलब्धियों के पीछे भाग रहा है, जबकि वास्तविक शांति, संतोष और आत्मिक आनंद धर्मग्रंथों के अध्ययन तथा गुरु के सान्निध्य से ही प्राप्त होता है। गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि आत्मा को सत्य, संयम और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करने वाले प्रकाश स्तंभ हैं। गुरु की आज्ञा और उनके बताए मार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति जीवन की अनेक कठिनाइयों और भ्रमों से मुक्त होकर आत्मोन्नति की ओर बढ़ता है।प्रवचन के दौरान साध्वी श्री चारित्रकला श्रीजी महारासा ने एक प्राचीन जैन ग्रंथ का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार एक आचार्य ने अपने जीवन में हुई हत्याओं का कठोर प्रायश्चित किया। तप, त्याग, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से उन्होंने अपने कर्मों का क्षय किया तथा अपने संयममय जीवन को सार्थक बनाते हुए अनेक महत्वपूर्ण धर्मग्रंथों की रचना की। उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि सच्चा पश्चाताप, आत्मशुद्धि और धर्म के प्रति अटूट समर्पण व्यक्ति को महान बना सकता है।उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथ केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने के लिए हैं। जब व्यक्ति ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है। जैन धर्म के आगम और शास्त्र मानव जीवन को संयम, सदाचार, करुणा, क्षमा और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करते हैं।साध्वी श्री चारित्रकला श्रीजी महारासा ने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन कुछ समय स्वाध्याय, चिंतन और गुरु वचनों के मनन के लिए निकालने का आह्वान करते हुए कहा कि धर्मग्रंथों का नियमित अध्ययन व्यक्ति के भीतर विवेक, संस्कार और आत्मविश्वास का विकास करता है। गुरु के मार्गदर्शन में किया गया स्वाध्याय जीवन को सफल, सार्थक और कल्याणकारी बनाता है।
प्रवचन में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धापूर्वक धर्मोपदेश का श्रवण किया तथा धर्म, स्वाध्याय और संयममय जीवन अपनाने का संकल्प लिया।

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