प्रकृति का अनमोल प्रहरी : साँपों का संरक्षण ही पर्यावरण की सुरक्षा है

रतलाम 10 जुलाई। ( News SSR )

गणेश मालवीय शासकीय शिक्षक | सर्प संरक्षक | पर्यावरण एवं वन्यजीव जागरूकता प्रेरक
पिपलोदा, जिला रतलाम (मध्य प्रदेश)

प्रकृति इस पृथ्वी पर जीवन का आधार है। मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पतियाँ, जल, वायु और सूक्ष्म जीव—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस विशाल सृष्टि में कोई भी जीव अनावश्यक नहीं है। प्रत्येक जीव की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है, जो पृथ्वी पर जीवन के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होती है।

मनुष्य स्वयं को सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है, किंतु यदि वह प्रकृति के नियमों की अनदेखी करता है, तो अंततः उसका अपना अस्तित्व भी संकट में पड़ जाता है। आज जलवायु परिवर्तन, जंगलों का विनाश, जैव विविधता में कमी और प्रदूषण जैसी समस्याएँ हमें यही संदेश देती हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना ही मानव सभ्यता का भविष्य है।

प्रकृति की इसी अद्भुत व्यवस्था में एक ऐसा जीव भी है जिससे अधिकांश लोग डरते हैं—साँप। उसका नाम सुनते ही भय, भ्रम और अंधविश्वास लोगों के मन में घर कर लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि साँप पृथ्वी के सबसे उपयोगी जीवों में से एक हैं। वे प्रकृति के संतुलन के प्रहरी हैं और किसानों के सच्चे मित्र भी।

दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत सहित विश्व के अनेक देशों में प्रतिवर्ष लाखों साँप केवल अज्ञानता और भय के कारण मार दिए जाते हैं। इनमें से अधिकांश साँप विषहीन होते हैं और मनुष्य को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। यदि लोगों में सही जानकारी और वैज्ञानिक सोच विकसित हो जाए, तो हजारों साँपों और अनेक मानव जीवनों को बचाया जा सकता है।


मेरा प्रकृति से जुड़ाव

मेरा नाम गणेश मालवीय है। मैं मध्य प्रदेश के रतलाम जिले की पिपलोदा तहसील का निवासी हूँ। पिछले 25 वर्षों से मैं शासकीय शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों को शिक्षित कर रहा हूँ। शिक्षक होना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का दायित्व है। मेरा हमेशा से विश्वास रहा है कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों को प्रकृति, पर्यावरण और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनाना भी उतना ही आवश्यक है।

लगभग 17 वर्ष पूर्व मेरे जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने मेरी सोच और जीवन की दिशा बदल दी। मैंने देखा कि केवल जानकारी के अभाव में लोग साँपों को देखते ही मार देते हैं। कई बार गाँवों में विषहीन साँपों को भी जहरीला समझकर लाठियों से पीट-पीटकर मार दिया जाता था। उस समय मेरे मन में एक प्रश्न उठा—क्या केवल डर के कारण किसी जीव का जीवन समाप्त कर देना उचित है?

यहीं से मेरे सर्प संरक्षण की यात्रा प्रारंभ हुई।

मैंने अनुभवी लोगों से सीखा, वन विभाग के अधिकारियों से मार्गदर्शन लिया, साँपों के व्यवहार का अध्ययन किया और स्वयं को प्रशिक्षित किया। धीरे-धीरे लोगों का विश्वास बढ़ता गया। जहाँ पहले साँप दिखाई देने पर लोग उसे मार देते थे, वहीं अब वे मुझे फोन करके बुलाने लगे।

आज लगभग 17 वर्षों की इस यात्रा में मुझे हजारों साँपों का सुरक्षित रेस्क्यू करने और उन्हें उनके प्राकृतिक आवास अर्थात जंगलों में छोड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।


मानव और साँप—दोनों की सुरक्षा मेरा उद्देश्य

जब भी किसी घर, खेत, विद्यालय, फैक्ट्री या सार्वजनिक स्थान पर साँप निकलने की सूचना मिलती है, तो मेरा पहला उद्देश्य होता है कि किसी भी व्यक्ति को नुकसान न पहुँचे और साथ ही साँप का जीवन भी सुरक्षित रहे।

मैं कभी भी साँप पकड़ने को साहस का प्रदर्शन नहीं मानता। यह एक जिम्मेदारी है, जिसमें धैर्य, ज्ञान और सावधानी सबसे अधिक आवश्यक होती है।

कई बार रात के अंधेरे में, तेज वर्षा के बीच, ऊँची घास में, कुओँ में, मकानों की छतों पर, अनाज के गोदामों में और खेतों के बीच जाकर साँपों का रेस्क्यू करना पड़ता है। हर परिस्थिति अलग होती है और हर साँप का व्यवहार भी अलग होता है।

सर्प रेस्क्यू का उद्देश्य कभी भी साँप को पकड़कर लोगों के सामने प्रदर्शन करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक उद्देश्य केवल उसे सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना है।


मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहयोगी—समर्पण मालवीय

प्रकृति के प्रति प्रेम केवल मेरे भीतर ही नहीं, बल्कि मेरे परिवार में भी है। मेरा पुत्र समर्पण मालवीय बचपन से ही मेरे साथ सर्प संरक्षण कार्यों में सहयोग करता रहा है।

उसने छोटी उम्र से ही यह समझ लिया कि प्रत्येक जीव का जीवन महत्वपूर्ण है। कई कठिन परिस्थितियों में उसने साहस, धैर्य और सेवा भावना का परिचय दिया।

वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा समर्पण मालवीय को “राष्ट्रपति जीवन रक्षा पदक” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान हमारे परिवार के लिए अत्यंत गौरव का विषय है।

मेरे लिए यह पुरस्कार केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि यदि बच्चों को बचपन से प्रकृति और मानव सेवा के संस्कार दिए जाएँ, तो वे समाज के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।


मानसून और साँपों का संबंध

भारत में वर्षा ऋतु प्रारंभ होते ही साँपों की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं। अधिकांश लोग यह समझते हैं कि बरसात में साँप अचानक अधिक निकलने लगते हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और है।

बारिश के कारण उनके बिलों में पानी भर जाता है। भोजन की तलाश और सुरक्षित स्थान की खोज में वे बाहर निकलते हैं। इसी कारण वे खेतों, घरों, स्कूलों, गोदामों और बस्तियों में दिखाई देने लगते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि साँप स्वयं मनुष्य के पास नहीं आना चाहते। वे केवल सुरक्षित स्थान की तलाश में भटकते हुए हमारे संपर्क में आ जाते हैं।

यदि हम उन्हें बिना छेड़े सुरक्षित दूरी बनाए रखें और प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता को बुलाएँ, तो किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा जा सकता है।


साँप आखिर काटता क्यों है ?

यह प्रश्न मुझसे सबसे अधिक पूछा जाता है।

मेरा उत्तर हमेशा एक ही होता है—

“साँप हमला नहीं करता, वह केवल अपना बचाव करता है।”

यदि कोई व्यक्ति गलती से उस पर पैर रख दे, उसे पकड़ने का प्रयास करे, पत्थर मारे या उसे घेर ले, तब वह स्वयं को बचाने के लिए काट सकता है।

साँप का विष भोजन प्राप्त करने और आत्मरक्षा का साधन है, बदला लेने का नहीं।

इसलिए यदि हम उसे बिना परेशान किए सुरक्षित निकलने का अवसर दें, तो अधिकांश साँप स्वयं ही वहाँ से चले जाते हैं।


प्रकृति का संतुलन और साँपों की भूमिका

साँपों को प्रकृति का संतुलन बनाने वाला जीव कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यदि खेतों और जंगलों से साँप समाप्त हो जाएँ तो चूहों की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी। यही चूहे किसानों की फसल, अनाज के भंडार और बीजों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं।

एक सामान्य साँप वर्षभर में सैकड़ों चूहों का शिकार करता है। इस प्रकार वह बिना किसी रासायनिक दवा के प्राकृतिक रूप से कीट एवं कृंतक नियंत्रण का कार्य करता है।

यही कारण है कि वैज्ञानिक साँपों को “किसान का प्राकृतिक मित्र” कहते हैं।

जहाँ साँप सुरक्षित हैं, वहाँ पारिस्थितिकी तंत्र अधिक संतुलित रहता है। जहाँ साँपों का अत्यधिक शिकार होता है, वहाँ प्राकृतिक संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगता है।
प्रकृति का अनमोल प्रहरी : साँपों का संरक्षण ही पर्यावरण की सुरक्षा है

भाग–2

भारतीय संस्कृति में नागों का स्थान

भारत विश्व के उन देशों में से एक है जहाँ प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि देवतुल्य माना गया है। यहाँ पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी और अनेक वन्यजीव हमारी संस्कृति और आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक है नाग।

भगवान शिव के गले में विराजमान नाग केवल आभूषण नहीं हैं, बल्कि यह संदेश देते हैं कि मनुष्य को भय पर विजय प्राप्त कर प्रकृति के प्रत्येक जीव के साथ सह-अस्तित्व का भाव रखना चाहिए। भगवान विष्णु अनंत शेषनाग पर शयन करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कालिय नाग का दमन किया, लेकिन उसका वध नहीं किया। इससे भी यह संदेश मिलता है कि भारतीय संस्कृति विनाश नहीं, बल्कि संतुलन और संरक्षण की शिक्षा देती है।

नाग पंचमी का पर्व भी प्रकृति और नागों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यद्यपि इस अवसर पर जीवित साँपों को पकड़कर दूध पिलाना या प्रदर्शन करना उचित नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टि से साँप दूध नहीं पीते। उन्हें उनकी प्राकृतिक अवस्था में रहने देना ही वास्तविक सम्मान है।

इसलिए धर्म का वास्तविक संदेश संरक्षण है, शोषण नहीं।


साँपों से जुड़े अंधविश्वास : भय नहीं, विज्ञान को अपनाइए

पिछले 17 वर्षों के अनुभव में मैंने पाया है कि लोगों को साँपों से उतना डर नहीं लगता, जितना उनसे जुड़े अंधविश्वासों से लगता है। फिल्मों, धारावाहिकों, लोककथाओं और अफवाहों ने साँपों के बारे में ऐसी धारणाएँ बना दी हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

अंधविश्वास 1 : साँप फोटो खींच लेता है

गाँवों में आज भी यह बात कही जाती है कि यदि किसी व्यक्ति ने साँप को मार दिया, तो दूसरा साँप उसकी तस्वीर अपनी आँखों में कैद कर लेता है और बाद में उसे ढूँढकर बदला लेता है।

वैज्ञानिक सत्य :
साँप के मस्तिष्क की संरचना ऐसी नहीं होती कि वह किसी मनुष्य का चेहरा वर्षों तक याद रख सके। उसकी आँखें कैमरा नहीं हैं और न ही वह किसी व्यक्ति की पहचान इस प्रकार कर सकता है। यह केवल लोककथाओं और फिल्मों से फैला भ्रम है।


अंधविश्वास 2 : नागिन बदला लेती है

भारतीय फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि यदि नाग को मार दिया जाए तो नागिन वर्षों तक उसका बदला लेती है।

वैज्ञानिक सत्य :
साँपों में मनुष्यों जैसी भावनात्मक स्मृति या प्रतिशोध लेने की क्षमता नहीं होती। वे अपने साथी की मृत्यु का बदला लेने नहीं आते। यदि कोई साँप उसी स्थान पर दिखाई देता है तो उसका कारण केवल वहाँ का सुरक्षित आवास या भोजन हो सकता है।


अंधविश्वास 3 : बीन बजाने से साँप नाचता है

यह धारणा वर्षों से चली आ रही है कि सपेरा बीन बजाता है और साँप संगीत सुनकर नाचने लगता है।

वैज्ञानिक सत्य :
साँप बाहरी ध्वनियों को मनुष्यों की तरह नहीं सुनता। उसके बाहरी कान नहीं होते। वह जमीन के कंपन और सामने की हलचल को महसूस करता है। सपेरा जब बीन हिलाता है तो साँप उसी गति को देखकर अपना फन उठाकर उसकी दिशा में सतर्क रहता है। वह संगीत पर नृत्य नहीं कर रहा होता।


अंधविश्वास 4 : साँप उड़ता है

कुछ क्षेत्रों में लोग कहते हैं कि साँप हवा में उड़कर हमला करता है।

वैज्ञानिक सत्य :
भारत में कोई भी साँप पक्षियों की तरह उड़ नहीं सकता। कुछ प्रजातियाँ पेड़ों के बीच शरीर फैलाकर कुछ दूरी तक फिसल सकती हैं, जिसे ग्लाइडिंग कहा जाता है। यह उड़ान नहीं है।


अंधविश्वास 5 : साँप के काटने पर पानी भी नहीं माँगता

यह कहावत लगभग पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

वैज्ञानिक सत्य :
सभी साँप विषैले नहीं होते। विषैले साँप के काटने पर भी यदि समय पर अस्पताल पहुँचकर एंटी-स्नेक वेनम उपचार मिल जाए तो अधिकांश लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। इसलिए घबराने के बजाय तुरंत चिकित्सा लेना सबसे आवश्यक है।


अंधविश्वास 6 : साँप दूध पीता है

नाग पंचमी पर अनेक स्थानों पर साँपों को दूध पिलाया जाता है।

वैज्ञानिक सत्य :
साँप स्तनधारी नहीं हैं। वे दूध नहीं पीते। अत्यधिक प्यास या तनाव की स्थिति में यदि वे कुछ बूंदें ग्रहण कर लें तो इसका अर्थ यह नहीं कि दूध उनका भोजन है। उनका प्राकृतिक भोजन चूहे, मेढ़क, छिपकलियाँ, पक्षियों के अंडे और अन्य छोटे जीव हैं।


अंधविश्वास 7 : हर साँप जहरीला होता है

यह सबसे खतरनाक भ्रम है।

वैज्ञानिक सत्य :
भारत में मिलने वाली अधिकांश प्रजातियाँ विषहीन होती हैं। केवल कुछ प्रमुख प्रजातियाँ ही अत्यधिक विषैली हैं। इसलिए हर साँप को मार देना उचित नहीं है।


भारत के प्रमुख विषैले साँप

भारत में अनेक प्रकार के साँप पाए जाते हैं, लेकिन मानव जीवन के लिए मुख्य रूप से चार प्रजातियाँ अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन्हें सामान्यतः “बिग फोर” कहा जाता है।

  1. भारतीय नाग (Indian Cobra)
    फन फैलाने वाला प्रसिद्ध साँप। इसके फन पर चश्मे जैसा निशान दिखाई दे सकता है।
  2. करैत (Common Krait)
    रात्रिचर साँप। इसका विष अत्यंत प्रभावशाली होता है।
  3. रसेल वाइपर (Russell’s Viper)
    खेतों में भी दिखाई देता है। इसकी पहचान शरीर पर बने गोल धब्बों से होती है।
  4. सॉ-स्केल्ड वाइपर (Saw-scaled Viper)
    आकार में छोटा लेकिन अत्यंत विषैला साँप।

इनके अतिरिक्त भारत में अनेक अन्य विषैले और हल्के विष वाले साँप भी पाए जाते हैं, परंतु अधिकांश साँप मनुष्य से दूर रहना ही पसंद करते हैं।


विषहीन साँप भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं

धामन (Rat Snake), चेकर्ड कीलबैक, वुल्फ स्नेक, सैंड बोआ, ट्रिंकेट स्नेक, ग्रीन वाइन स्नेक जैसी अनेक प्रजातियाँ विषहीन होती हैं। ये खेतों में चूहों और अन्य हानिकारक जीवों को नियंत्रित करती हैं।

दुर्भाग्य से लोग इन्हें भी नाग समझकर मार देते हैं।


सर्प संरक्षण क्यों आवश्यक है?

यदि किसी जंगल से बाघ समाप्त हो जाएँ तो हिरणों की संख्या बढ़ जाती है। यदि गिद्ध समाप्त हो जाएँ तो मृत पशुओं का प्राकृतिक निस्तारण प्रभावित होता है।

उसी प्रकार यदि साँप समाप्त हो जाएँ तो चूहों की संख्या अनियंत्रित हो जाएगी। इससे किसानों की फसल, अनाज और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

प्रकृति की प्रत्येक कड़ी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। किसी एक जीव का नष्ट होना पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।

इसी कारण वैज्ञानिक बार-बार कहते हैं कि साँप केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन के प्रहरी हैं।


मेरे अनुभव की सबसे बड़ी सीख

हजारों साँपों का रेस्क्यू करने के बाद मैंने एक बात निश्चित रूप से सीखी है—

साँप से अधिक खतरनाक अज्ञानता है।

जब लोगों को सही जानकारी मिलती है, तब उनका भय समाप्त हो जाता है। वही व्यक्ति, जो पहले साँप को देखते ही उसे मार देता था, आज मुझे फोन करके कहता है—”सर, आइए… साँप को सुरक्षित बचा लीजिए।”

यही परिवर्तन मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है और यही मेरे जीवन का उद्देश्य भी है।
प्रकृति का अनमोल प्रहरी : साँपों का संरक्षण ही पर्यावरण की सुरक्षा है

भाग–3

साँप काटने पर घबराएँ नहीं, सही उपचार अपनाएँ

भारत में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लोग साँप के काटने की घटनाओं का सामना करते हैं। इनमें से अनेक मामलों में समय पर सही उपचार मिलने से रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है। दुर्भाग्य से आज भी कई लोग वैज्ञानिक उपचार के बजाय झाड़-फूँक, तंत्र-मंत्र या घरेलू उपायों पर विश्वास कर देते हैं, जिससे उपचार में देरी होती है और स्थिति गंभीर हो सकती है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हर साँप विषैला नहीं होता। इसलिए किसी भी घटना में घबराने के बजाय रोगी को शांत रखना और शीघ्र अस्पताल पहुँचाना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

साँप काटने पर क्या करें?

यदि किसी व्यक्ति को साँप काट ले, तो सबसे पहले उसे घबराने न दें। डर और घबराहट से हृदय गति बढ़ सकती है, जिससे यदि विष शरीर में गया है तो वह तेजी से फैल सकता है।

रोगी को आराम से लिटाएँ, काटे गए अंग को यथासंभव स्थिर रखें और अनावश्यक चलने-फिरने से बचाएँ। यदि हाथ या पैर में काटा है तो उस अंग को अधिक न हिलाएँ।

रोगी को जितनी जल्दी हो सके ऐसे अस्पताल ले जाएँ जहाँ साँप के विष के उपचार की सुविधा उपलब्ध हो।

यदि सुरक्षित रूप से संभव हो तो साँप का रंग, आकार या पहचान याद रखने का प्रयास करें, लेकिन उसे पकड़ने या मारने का प्रयास कभी न करें। डॉक्टर के उपचार के लिए यह आवश्यक नहीं है कि साँप को अस्पताल ले जाया जाए।


क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए?

मेरे अनुभव में कई लोग अनजाने में ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जो रोगी के लिए हानिकारक हो सकती हैं।

  • काटे गए स्थान को चाकू या ब्लेड से नहीं काटना चाहिए।
  • विष चूसने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
  • बहुत कसकर रस्सी, तार या कपड़ा नहीं बाँधना चाहिए।
  • झाड़-फूँक, तांत्रिक या ओझा के पास समय नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • शराब, तंबाकू या कोई भी नशीला पदार्थ नहीं देना चाहिए।
  • रोगी को दौड़ाना या तेज चलाना नहीं चाहिए।

समय पर अस्पताल पहुँचना ही सबसे प्रभावी उपचार है।


वन्यजीव संरक्षण और हमारी जिम्मेदारी

भारत में साँप केवल एक जीव नहीं, बल्कि देश की जैव विविधता की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। अधिकांश साँप भारतीय कानून के अंतर्गत संरक्षित वन्यजीव हैं।

बिना अनुमति किसी साँप को पकड़ना, पालना, बेचना या मारना कानून का उल्लंघन हो सकता है। इसलिए यदि कहीं साँप दिखाई दे तो उसे स्वयं पकड़ने का प्रयास न करें। प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता या वन विभाग से संपर्क करें।

सर्प संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज, किसानों, विद्यार्थियों और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।


विद्यालयों और महाविद्यालयों में मेरा अभियान

एक शासकीय शिक्षक होने के कारण मुझे विद्यार्थियों के साथ कार्य करने का अवसर मिलता है। मेरा मानना है कि यदि बचपन से ही बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित कर दी जाए तो आने वाली पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण को अपना कर्तव्य समझेगी।

इसी उद्देश्य से मैं विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न मंचों पर जाकर साँपों और वन्यजीवों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देता हूँ।

मैं विद्यार्थियों को समझाता हूँ कि—

  • हर साँप जहरीला नहीं होता।
  • साँप बिना कारण हमला नहीं करते।
  • अंधविश्वासों पर नहीं, विज्ञान पर विश्वास करें।
  • किसी भी वन्यजीव को नुकसान न पहुँचाएँ।
  • पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

जब बच्चे यह जानकारी अपने परिवार तक पहुँचाते हैं तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है।


मेरे रेस्क्यू अभियान की कुछ यादें

पिछले सत्रह वर्षों में अनेक ऐसे अवसर आए जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता।

कई बार आधी रात को फोन आया कि घर के भीतर जहरीला साँप निकल आया है। कई बार स्कूल के कक्षा-कक्ष में साँप मिला। कभी खेत में काम करते किसान भयभीत हो गए, तो कभी अनाज के गोदाम में साँप छिपा मिला।

बरसात के दिनों में तो एक ही दिन में कई-कई स्थानों पर जाना पड़ता है।

हर बार लोगों की पहली प्रतिक्रिया होती है—”सर, जल्दी आइए… इसे मारना नहीं है, बचा लीजिए।”

जब मैं सुरक्षित रेस्क्यू करके साँप को जंगल में छोड़ता हूँ, तब लोगों के चेहरे पर जो संतोष दिखाई देता है, वही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।


परिवार का सहयोग

इस कार्य में मेरे परिवार का सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

मेरा पुत्र समर्पण मालवीय बचपन से ही मेरे साथ सर्प संरक्षण अभियान में सहभागी रहा है। उसका साहस, अनुशासन और सेवा भावना प्रत्येक युवा के लिए प्रेरणादायक है।

वर्ष 2019 में राष्ट्रपति जीवन रक्षा पदक से सम्मानित होना उसके जीवन की उपलब्धि ही नहीं, बल्कि समाज सेवा और प्रकृति संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है।

मुझे गर्व है कि नई पीढ़ी प्रकृति संरक्षण के इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।


पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक अर्थ

आज पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है।

जब हम किसी घायल पक्षी को बचाते हैं, किसी साँप को सुरक्षित जंगल में छोड़ते हैं, किसी पेड़ को कटने से बचाते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखते हैं, तब भी हम पर्यावरण संरक्षण कर रहे होते हैं।

प्रकृति केवल जंगलों में नहीं रहती। वह हमारे खेतों, गाँवों, शहरों, विद्यालयों और हमारे आसपास के प्रत्येक जीव में बसती है।

यदि हम केवल अपने लिए प्रकृति चाहते हैं और उसके जीवों को नष्ट करते रहेंगे, तो भविष्य में संतुलन बनाए रखना असंभव हो जाएगा।


मेरी समाज से अपील

मैं सभी नागरिकों से हाथ जोड़कर निवेदन करता हूँ—

यदि आपके घर, खेत, विद्यालय, फैक्ट्री या आसपास कहीं भी साँप दिखाई दे तो उसे मारिए मत।

घबराइए मत।

सुरक्षित दूरी बनाए रखिए।

प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता या वन विभाग को सूचना दीजिए।

याद रखिए—

जिस प्रकार मनुष्य को जीने का अधिकार है, उसी प्रकार साँप को भी इस पृथ्वी पर जीने का अधिकार है।

हमारा एक सही निर्णय एक जीवन बचा सकता है और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में योगदान दे सकता है।


प्रकृति के प्रति हमारा संकल्प

आइए हम सभी मिलकर यह संकल्प लें—

हम किसी भी वन्यजीव को बिना कारण नुकसान नहीं पहुँचाएँगे।

अंधविश्वासों के स्थान पर वैज्ञानिक सोच अपनाएँगे।

बच्चों को प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनाएँगे।

पर्यावरण संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बनाएँगे।

और जब भी कहीं साँप दिखाई देगा, हम उसे मारने के बजाय सुरक्षित बचाने का प्रयास करेंगे।

प्रकृति बचेगी तो जीवन बचेगा।

साँप बचेंगे तो खेत बचेंगे।

खेत बचेंगे तो अन्न बचेगा।

अन्न बचेगा तो मानव सभ्यता सुरक्षित रहेगी।
प्रकृति का अनमोल प्रहरी : साँपों का संरक्षण ही पर्यावरण की सुरक्षा है

भाग 4 समापन

प्रकृति हमें क्या सिखाती है?

प्रकृति सबसे बड़ी गुरु है। वह बिना किसी भेदभाव के सभी को समान रूप से जीवन देती है। सूर्य का प्रकाश, वायु, जल और धरती किसी एक प्रजाति के लिए नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के लिए हैं। यदि हम प्रकृति का गहराई से अध्ययन करें तो पाएँगे कि उसने प्रत्येक जीव को एक विशिष्ट दायित्व सौंपा है। कोई भी जीव अनावश्यक नहीं है।

मनुष्य स्वयं को सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है, लेकिन बुद्धिमत्ता तभी सार्थक है जब उसके साथ संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। यदि हमारी प्रगति के कारण जंगल नष्ट हो जाएँ, नदियाँ प्रदूषित हो जाएँ और वन्यजीव समाप्त होने लगें, तो यह विकास नहीं, बल्कि विनाश का संकेत है।


आज की सबसे बड़ी चुनौती

आज भारत सहित पूरी दुनिया में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। जंगलों का क्षेत्र घट रहा है, सड़कें और इमारतें बढ़ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ते जा रहे हैं। साँप, तेंदुए, भालू, बंदर और अनेक अन्य जीव मजबूरी में मानव बस्तियों के आसपास दिखाई देने लगे हैं।

ऐसी स्थिति में समाधान वन्यजीवों को मारना नहीं, बल्कि उनके साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व की व्यवस्था विकसित करना है। यदि हम प्रकृति के लिए स्थान छोड़ेंगे, तो प्रकृति भी हमारे लिए सुरक्षित रहेगी।


युवा पीढ़ी से मेरी अपेक्षा

मैं पिछले 25 वर्षों से एक शिक्षक हूँ। इस दौरान हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाने का अवसर मिला है। मेरा विश्वास है कि आने वाले भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा हैं।

मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ—

मोबाइल और सोशल मीडिया के साथ-साथ प्रकृति को भी समय दीजिए।

पेड़ों को पहचानिए।

पक्षियों की आवाज़ सुनिए।

वन्यजीवों को समझिए।

पर्यावरण संरक्षण को केवल एक विषय नहीं, बल्कि जीवन का मूल्य बनाइए।

यदि आज का युवा प्रकृति से जुड़ जाएगा, तो आने वाला भारत पर्यावरण संरक्षण में विश्व का नेतृत्व कर सकता है।


सर्प संरक्षण केवल एक कार्य नहीं, एक सेवा है

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं—

“क्या आपको साँपों से डर नहीं लगता?”

मेरा उत्तर होता है—

“डर ज्ञान की कमी से पैदा होता है।”

जब हम किसी जीव को समझ लेते हैं, तो उसका भय समाप्त होने लगता है।

सर्प संरक्षण मेरे लिए कोई रोमांच या साहस दिखाने का माध्यम नहीं है। यह मानवता, पर्यावरण और वन्यजीवों के प्रति मेरी जिम्मेदारी है।

जब किसी परिवार का भय दूर होता है, जब किसी बच्चे के मन से साँपों के प्रति गलत धारणाएँ समाप्त होती हैं, जब किसी किसान के खेत से सुरक्षित रेस्क्यू कर साँप को जंगल में छोड़ा जाता है, तब मुझे लगता है कि मेरे जीवन का उद्देश्य सार्थक हो रहा है।


मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

यदि कोई मुझसे पूछे कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, तो मेरा उत्तर किसी पुरस्कार या सम्मान का नाम नहीं होगा।

मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज मेरे क्षेत्र के अनेक लोग साँप देखते ही उसे मारते नहीं, बल्कि मुझे या प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता को फोन करते हैं।

यह परिवर्तन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि जागरूक समाज का प्रतीक है।

मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा पुत्र समर्पण मालवीय भी इसी सेवा कार्य में मेरे साथ जुड़ा। वर्ष 2019 में राष्ट्रपति जीवन रक्षा पदक प्राप्त करना उसके साहस, सेवा और मानवता के प्रति समर्पण का राष्ट्रीय सम्मान है। यह सम्मान हमें आगे भी समाज और प्रकृति की सेवा के लिए प्रेरित करता है।


समाज के लिए मेरा संदेश

मैं सभी नागरिकों से विनम्र आग्रह करता हूँ—

यदि आपके घर, खेत, विद्यालय, कार्यालय या आसपास कहीं भी साँप दिखाई दे—

घबराइए नहीं।

भीड़ इकट्ठी मत कीजिए।

उसे मारने का प्रयास मत कीजिए।

सुरक्षित दूरी बनाए रखिए।

प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता या वन विभाग को सूचना दीजिए।

याद रखिए—

साँप मनुष्य का शत्रु नहीं है। वह भी केवल अपने जीवन की रक्षा करना चाहता है।


हम सबकी साझा जिम्मेदारी

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार, वन विभाग या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है।

जब हम एक पेड़ बचाते हैं, एक पक्षी के लिए पानी रखते हैं, एक घायल जीव की सहायता करते हैं या एक साँप को सुरक्षित जंगल तक पहुँचाने में सहयोग करते हैं, तब हम केवल एक जीव की नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति की रक्षा कर रहे होते हैं।

धरती हमारे पूर्वजों की संपत्ति नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। हमें इसे पहले से बेहतर स्थिति में उन्हें सौंपना है।


मेरा संकल्प

मैंने अपने जीवन के पिछले 17 वर्ष सर्प संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता को समर्पित किए हैं।

आने वाले वर्षों में भी मेरा प्रयास रहेगा कि अधिक से अधिक लोगों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुँचे, अंधविश्वास समाप्त हों और प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने।

एक शिक्षक के रूप में मैं शिक्षा देता रहूँगा।

एक सर्प संरक्षक के रूप में जीवन बचाता रहूँगा।

और एक जागरूक नागरिक के रूप में प्रकृति की रक्षा का संदेश फैलाता रहूँगा।


अंतिम संदेश

प्रकृति हमें जीवन देती है।

वृक्ष हमें श्वास देते हैं।

नदियाँ हमें जल देती हैं।

पृथ्वी हमें अन्न देती है।

और साँप हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति का प्रत्येक जीव किसी न किसी रूप में मानव जीवन का रक्षक है।

आइए, हम अपने भय को ज्ञान में, अंधविश्वास को विज्ञान में और हिंसा को संरक्षण में बदलें।

यही सच्ची पर्यावरण सेवा है।

यही मानवता है।

यही भारतीय संस्कृति का संदेश है।


आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें—

“न साँपों को मारेंगे, न किसी वन्यजीव को अनावश्यक नुकसान पहुँचाएँगे।
प्रकृति का सम्मान करेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे और आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध धरती सौंपेंगे।”

प्रेरक संदेश

“साँप शत्रु नहीं, प्रकृति के प्रहरी हैं।
उन्हें बचाइए, क्योंकि प्रकृति बचेगी तो मानवता बचेगी।”

“प्रकृति का सम्मान ही सच्चा धर्म है,
और प्रत्येक जीव की रक्षा ही सबसे बड़ी मानवता।”

लेखक
गणेश मालवीय
शासकीय शिक्षक | सर्प संरक्षक | पर्यावरण एवं वन्यजीव जागरूकता प्रेरक
पिपलोदा, जिला रतलाम (मध्य प्रदेश)

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