शासकीय मंदिर की बेशकीमती भूमि पर अतिक्रमणकारी का दावा खारिज, कोर्ट ने माना राज्य शासन का स्वामित्ववर्ष 1984 से चला आ रहा विवाद समाप्त, 60 वर्ष के कब्जे का दावा सिद्ध करने में नाकाम रहा वादी

कलेक्टर रतलाम ही रहेंगे मंदिर भूमि के प्रबंधक

रतलाम,21अगस्त( News SSR )। सप्तम जिला न्यायाधीश रतलाम राजेश नामदेव की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ग्राम कुंवरवाड़ा (तहसील रावटी) स्थित शासकीय मंदिर श्री नागेश्वरजी की बेशकीमती भूमि पर अतिक्रमणकारी की अपील को खारिज कर दिया है। न्यायालय के इस निर्णय से विवादित भूमि पर राज्य शासन का स्वत्व एवं स्वामित्व पूरी तरह बरकरार रहेगा।

राज्य शासन की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने बताया कि इस विवादित भूमि को लेकर वर्ष 1984 से कानूनी लड़ाई चल रही थी। इससे पूर्व, अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश सैलाना द्वारा 31 अक्टूबर 2025 को फैसला सुनाते हुए रावटी निवासी वादी कृष्ण कुमार पिता मांगीलाल तेली व अन्य का दावा निरस्त कर दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ वादी ने जिला न्यायालय में प्रथम अपील दायर की थी।

कलेक्टर का नाम ही दर्ज रहेगा प्रबंधक के रूप में
अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने राजस्व अभिलेखों, खसरा एवं खतौनी सहित अन्य दस्तावेजों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि विवादित भूमि स्पष्ट रूप से मंदिर श्री नागेश्वरजी, कुंवरवाड़ा की है और इसके प्रबंधक के रूप में कलेक्टर रतलाम का नाम दर्ज है। वादी ऐसा कोई भी वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने में असफल रहा, जिससे वह भूमि पर अपना स्वामित्व सिद्ध कर सके।
​60 वर्ष के कब्जे का दावा खारिज

वादी की ओर से तर्क दिया गया था कि वह विवादित भूमि पर 60 से अधिक वर्षों से शांतिपूर्ण ढंग से खेती कर रहा है, इसलिए प्रतिकूल आधिपत्य (Adverse Possession) के आधार पर उसे स्वामित्व का अधिकार मिले। हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक कब्जा होना प्रतिकूल आधिपत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वादी यह सिद्ध करने में नाकाम रहा कि वह किस निश्चित तिथि से कब्जे में आया और उसके कब्जे की प्रकृति क्या थी।

​बार-बार केस लगाकर अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग
मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि वादी पक्ष द्वारा बार-बार एक ही प्रकृति के दावे लगाकर न्यायालयीन प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया। पूर्व में 1984 में प्रस्तुत व्यवहार वाद 1992 में निरस्त हुआ था, जिसकी प्रथम अपील 1992 और द्वितीय अपील 2011 में समाप्त हुई थी। इसके बाद वर्ष 2016 में पुनः इसी तरह का केस दायर किया गया।

प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई की छूट
अदालत ने माना कि तहसीलदार व कलेक्टर द्वारा वादी को दिए गए अतिक्रमण संबंधी नोटिस व कानूनी कार्रवाई किसी भी तरह का अवैध हस्तक्षेप नहीं हैं। न्यायालय ने अपने निर्णय की प्रति कलेक्टर रतलाम और तहसीलदार रावटी को भेजकर भूमि पर विधि अनुसार कार्रवाई करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। प्रकरण में राज्य शासन का पक्ष शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने मजबूती से रखा।

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