
रतलाम, 6 अगस्त। ( News SSR )स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत गुरुवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। दोनों सत्रों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।

अपने उद्बोधन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने कहा कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। भगवान, गंगा तथा अन्य दिव्य स्वरूप पवित्र हैं, किंतु आत्मज्ञान मनुष्य को परम पवित्रता की ओर ले जाता है। यह ज्ञान योग एवं साधना से सिद्ध होता है। गुरु किसी को बाहर से कुछ नहीं देता, बल्कि उसके भीतर विद्यमान दिव्यता का स्मरण करता है।
उन्होंने कहा कि स्मृति ही हमारी सबसे बड़ी साधना है। शास्त्रों में स्मरण को सर्वोच्च साधना बताया गया है, जिसमें किसी प्रकार का आडंबर नहीं होता। भगवान श्री हनुमान ने भी भगवान श्रीराम की कृपा स्मरण और समर्पण के माध्यम से प्राप्त की थी, न कि बाह्य प्रदर्शन से।
आचार्य श्री ने कहा कि जब तक मनुष्य मोह में बंधा रहता है, तब तक शोक समाप्त नहीं होता। महाभारत में अर्जुन का मोह दूर होने पर ही उसे श्रीकृष्ण का दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने वर्तमान समय में आध्यात्मिक मूल्यों से भटकाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज अनेक संत-महात्मा भी मीडिया, राजनीति और धन के आकर्षण में उलझते जा रहे हैं।
श्रीमद्भागवत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य प्रतिदिन श्रद्धा से गीता और भागवत का चिंतन करे तो वह संसार रूपी दुःख-सागर से पार होने का मार्ग प्राप्त कर सकता है। भागवत का श्रोता केवल कथा सुनने वाला नहीं, बल्कि अपने जीवन में उसके आदर्शों को धारण करने वाला होना चाहिए। देह, इंद्रियों, मन और बुद्धि से ऊपर उठकर ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन से भी आश्रम और साधना से जुड़ें। बचपन से भजन और साधना का संस्कार जीवन को दिव्य शक्ति प्रदान करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना प्राणप्रिय सखा कहा था, इसलिए साधक को भी अर्जुन जैसी जिज्ञासा और परीक्षित जैसी श्रद्धा विकसित करनी चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि संसार एक गहरे कुएँ के समान है और सद्गुरु ही उस रस्सी और बाल्टी के समान हैं, जिनके माध्यम से जीव इस संसार से पार हो सकता है। उन्होंने कहा कि सच्चा कीर्तन और सच्ची साधना वही है, जो साधक के भीतर छिपे दिव्य स्वरूप को प्रकट कर दे।
अपने प्रवचन में उन्होंने वृंदावन की भक्ति, श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम तथा गुरु-शिष्य परंपरा का भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब शिष्य पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ साधना करता है, तो एक दिन वही गुरु बनने की पात्रता प्राप्त करता है। गुरु का उद्देश्य शिष्य को सदैव शिष्य बनाए रखना नहीं, बल्कि उसे आत्मज्ञान के शिखर तक पहुँचाना होता है।
उन्होंने कहा कि जीवात्मा और परमात्मा का संबंध अभिन्न है तथा आत्म साक्षात्कार ही जीवन का परम लक्ष्य है। संतों द्वारा बताए गए सत्य का अनुभव साधना और गुरु-कृपा से ही संभव है।
कार्यक्रम का संचालन संजय मिश्रा शास्त्री ने किया।
सायंकालीन आरती में रतलाम विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष मनोहर पोरवाल, नेपाली परिषद अध्यक्ष नरेंद्र श्रेष्ठ, श्री दामोदर वंशीय जूना गुजराती दर्जी समाज के अध्यक्ष आनंद परमार, राजेंद्र परमार, कमलेश पंवार, मनीष परमार, महेश सोलंकी, गितेश परमार, रामचंद्र परमार, पुखराज भारत सोलंकी, मनोज परमार, दिलीप परमार, मुकेश महेश्वरी, सचिन परमार, दिनेश पडियार, दिनेश भीमनोदा, पुष्पेंद्र जोशी, सतीश शर्मा सहित आश्रम के संतगण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित रहे।